वो नज़र, जिसमे चेतना का बीज है, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। यक्ष,देव,गंधर्व,जिस सुख की तलाश में धरा का रुख़ लेते, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। हम जहाँ थे,वही रहे,परंतु तीनो लोक लीन जिस दृश्य में, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। ब्रम्हांड के समस्त ग्रह,नक्षत्र, जिसकी परिक्रमा लगाते, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। जन्मो-जन्मो के नास्तिक थे,जिसके गुणों को पुज आस्तिक हुए, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। ख्वाब देखे,सपने सजाए,लिख दिया, मगर असल में जिसका इंतज़ार है, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। -तुषार रामडिया