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Showing posts from September, 2017
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वो नज़र, जिसमे चेतना का बीज है, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। यक्ष,देव,गंधर्व,जिस सुख की तलाश में धरा का रुख़ लेते, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। हम जहाँ थे,वही रहे,परंतु तीनो लोक लीन जिस दृश्य में, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। ब्रम्हांड के समस्त ग्रह,नक्षत्र, जिसकी परिक्रमा लगाते, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। जन्मो-जन्मो के नास्तिक थे,जिसके गुणों को पुज आस्तिक हुए, हाँ वो नज़र तुम्हारी है। ख्वाब देखे,सपने सजाए,लिख दिया, मगर असल में जिसका इंतज़ार है, हाँ वो नज़र तुम्हारी है।                -तुषार रामडिया
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                 "  चौराहा " चौराहा, वो स्थान जो चार रास्ते देता हो। मै ऐसे ही किसी रास्ते पर, जीवन भर से खड़ा हूँ। हर मार्ग पर थोडा चल, पुनः स्वयं को किसी चौराहे पर पाता हुँ। सोचा मरण उपरांत, ये चौराहे खत्म होंगे। तब मै किसी एक निश्चित, मार्ग पर चल दूंँगा। परन्तु तभी मैंने, एक लाश देखी। लाश के चारो ओर, ये चर्चा चल रही थी, इसका किस विधि अंतिम संस्कार करना है। अचानक मानो उस प्राण हीन शव ने मुझसे कहा, सदैव चार ही मार्ग रहेंगे, परंतु जब स्वयं तुम निर्णय ले सको की तुम्हे किस मार्ग पर जाना है, तभी केवल तभी जीवन घटित होता है। यही जीने का एक मात्र मार्ग है, चाहे चौराहे जितने आए, जीवन एकांकी है।              -तुषार रामडिया
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पास मेरे बैठी,साँस मेरी बहकी, नज़रे जब मिली,नियत मेरी बहकी। एक झलक पाने को,सर चारो ओर मटकता था, एक ही जगह दिखती,बाकी सारी जगह बहकी-बहकी। मुस्कुराती,शर्माती,पल्के धीरे से झपकाती, मुझमे कुछ ना बचा,आज क़ायनात बहकी-बहकी। बहका मन,बहका तन, उसे पता ना चले,तभी धड़कन चले सहमी-सहमी। आज उससे पूछा जाए,मौत से आज खेला जाए, शायद हाँ करदे,आज किस्मत जो है बहकी-बहकी। लो चला गया वक्त,हो गई देर, पास अब वो नही,कैसा है ये खेल। उसे बताने में सदिया बीत जाएगी, ऐसी ही ना जाने कितनी, बहकी-बहकी कविता रच जाएगी।               -तुषार रामडिया
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एक दिवस मैं समय देखता, बैठा अचल-शिथिल था। समस्त कर्मो का लेखा-जोखा, ह्रदय में स्थित था। तभी सात चक्रो, की एक-एक पुकारे आई। मेरे मन,इन्द्रियो,बुद्धि पर, जैसे कम्पन लाई। पहला था मूलाधार, भौतिक जीवन का प्रशंसक था। भोजन और निद्रा में, उन्मुख था। परंतु मेरी कामनाओ की, एक छोटी पोटली थी। उस पोटली से द्वितीय चक्र स्वाधिष्ठान बोला। उसने प्रकाशित किए कई स्वप्न, उन्हें पकड़ कर मुझे सोने को बोला। लेकिन उन कामनाओ में, कुछ ऐसे भी सपने थे। जिनके प्राप्ति के लिये हमने, चारो हाथ-पैर फेके थे। उन्ही हाथ-पैर के अखाड़ो में, तीसरा मणिपुर आ गया। ऊर्जा का बवंडर, अंग-अंग में छा गया। उस अपार ऊर्जा को, कोई कैसे व्यक्त करे। उस ऊर्जा के मिलन से, व्यक्ति कर्म करे और मस्त रहे। लेकिन कर्मो के दलदल में, कोई विचार आ गया। उस विचार ने खींच हमें, चौथे अनाहत पर ला दिया। यह नैतिक अथवा सौन्दर्यपरक, यहा कदम-कदम पर रचना थी। परंतु एक रचना की ऐसी गंभीर महिमा थी, उस महिमा का मुग्धरस नए ठिकाने लाया। विशुद्ध नाम का पांचवा चक्र आया, जो धार्मिक एवं सहचर था। सम्पूर्ण धार्मिक सहचरों में, एक प्रश्न ...
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                    "शांति" शांति है अमृत पान, मनुष्य को प्राप्त ईश्वरी वरदान। नहीं होती प्रत्येक भाग्य में, नीम सी कड़वी लगती शुरुआत में। शांति है,वो प्रिये, जो मिलती विष-पान से। परिश्रम,संकल्प बिन दिशा अधूरी है। उदहारण है बुद्ध, शांति प्राप्ति में एकांत जरूरी है। राम,कृष्ण,शंकर,हनुमान, शांति ही श्रेष्ठ सिद्ध करे भगवान। जन्मे मृत्यु लोक में, कर्म निर्णायक होगा। कर्मयोग या ज्ञानयोग, एक मार्गी होना होगा। कर्मयोग कहलाता श्रेष्ठ, कृष्ण ने सिद्ध किया है। परंतु अनेक ऐतिहासिक कथाओं में, कर्मयोगी को गुरु ज्ञानयोगी मिला है। स्थिरता जिस हृदय में, उसे साधु कहते है। ब्रम्हा सा आचरण जिनका, उन्हें ब्राम्हण कहते है। मूर्ख कहलाते पृथ्वी पर, जो नाथ के होते लोगो को अनाथ कहते है। नाथ ही यथार्त, क्या धर्म जाती और समाज। प्रारम्भिक स्थान, ही होता अंतिम ठिकाना। जैसे किसी भटकी बूंद का, फिर सागर हो जाना। चार दिवस है, व्यतीत करो शांति से। अंततः कर्म अनुसार, बैकुण्ड या नर्क,इन्ही लोक को जाना।         ...
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                  "अंधकार" मै अंधकार की ओर बढ़ रहा हूँ। हाथ मे मशाल लिए, चीख़ता ख़ामोशी की ओर बढ़ रहा हूँ। दौड़ रहे कदम, परंतु जहाँ था वहीँ खड़ा हूँ। मैं अंधकार की और बढ़ रहा हूँ।। मिलतेे साथ,थामते हाथ, यही खेल निरंतर खेल रहा हूँ। अज्ञानी नाविक,दिशा अनजान, मंज़िल शून्य रट रहा हूँ। मैं अंधकार की ओर बढ़ रहा हूँ।। हर शब्द व्यर्थ, रात में सूरज खोज रहा हूँ। कैसे, क्या व्यक्त करू, अनजान सफर ढो रहा हूँ। मूर्ख हूँ, कविता में अपनी व्यथा पिरो रहा हूँ। मैं अंधकार की ओर बढ़ रहा हूँ।।              -तुषार रामडिया
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               " शून्य बन तू " सृष्टि के प्रारंभ काल मे, एक ध्वनि प्रज्वलित विचरती है। वही ध्वनि समस्त प्राणियों के, भीतर पग धरती है। वही रहस्य, वही काल, वही कृष्ण-महाकाल, उस रचना शक्ति को प्रथम जान, वही ॐ तू श्रेष्ठ मान। समस्त युग तू एक जान, कर्म,अकर्म समान मान। तू मौन-धर, शस्त्र तान, तप में जल ए ब्रम्ह महान। अभी पूण नहीं तू आधा है, कोई रिक्त स्वर पुराना है। समस्त विश्व छलावा है, अनंत सागर क्षितिज धारा है। तू ज्ञान जान, नाविक मान, स्वयं को यात्रा एवं यात्री जान। पग धर तू हे मेघराज, प्राचिन धरा का खेल जान। आँख खोल जो यह तारे है, किसी वस्त्र के धागे है। सप्तऋषि,वसु सभी पुराने है, जहाँ घूम-घूम बस जाते है। तू लीन हो,स्वप्न तार दे, प्रचण्ड हुँकार आज ले। कोई समय नहीं चलाता है, तू ज्ञानी मूर्ख बन जाता है। ध्यान कर तू कर्म जान, मृत्यू कोभी तू जन्म जान। समस्त शास्त्र और पूराणे है, तेरे भीतर पधारे है। ना कोई कही कुछ लाया है, देह कर्म को आया है। भीतरी रिक्तता को त्याग दे, आज पूणर्ता ही त्याग दे। सत्य है , अंत कही भी, ...
हर प्रभात की नई किरण, किसी विचित्र भाषा की बोली है। हर दिन जग में इसकी बोनी, इसी तरह से होनी है। फिर क्यों पुकारे ऐसे, जैसे जन्मो का नाता हो, कही किसी छोर ने एक डोर से बांधा हो। मिला ना उत्तर, अंधकार भी रात्रि बन कर छा गया। ह्र्दय हमारा टिमटिमाते तारो पर ऐसा भा गया, बोला तारो ने भाषा विचित्र कुछ बोली है। बुद्धि दौड़ी ज्ञान के शहर, परन्तु चीख ने ऊर्जा पाई थी। सम्पूर्ण देह बेढल, ध्वनि कर्णो तक कहने आई थी। सोजा जुगनू प्यारे, अब अधिक ना तू जग पाएगा। अभी भी जिज्ञासु बना रहा, तोह विश्राम कहो कब पाएगा। मस्तिष्क बोला होले से, मैं बात सत्य ये कहता हूं, पलको के निकट हु, अध्यन में समय अधिक ना लेता हूं। तू अर्ध निद्रा में , यह खेल कर सोया है। तेरे नए ख़यालो का प्रकाश, ही बना प्रभात की वाणी है। शेष जो फेला अंधकार, जुगनू मेरे इसी में तोह रोशनी लानी है। -तुषार रामडिया