Posts

Showing posts from November, 2018
(चहरा और गांव) गांव, सभी कहते है गाव यह है वह है। लेकिन मेरे लिए गांव यानी वह, उसका चेहरा। गांव मुझे उसकी, उसके चेहरे की याद दिलाता और उसका चेहरा किसी सादगी से पूर्ण खुशहाल ग्रामीण परिवेश की। ख़ेर हर कोई अपने अनुभवों से हर विषय पर अपनी अलग परिभाषा देते है। इसी तरह मेरा भी अपना अनुभव है, मेरा अपना गांव, यानी मेरी अपनी परिभाषा। प्रथम भाव गांव की प्रकृति जो आजाद, बेबाक और निरंतर बहने वाली, जैसे उसका व्यक्तिव जो अपने आप में आजाद, बेबाक और निरंतर बहने वाला था। प्रकृति कभी किसी का नियम या कानून नहीं मानती, उसी तरह वह अपने आप में स्वच्छंद बहने वाली थी, मानो जैसे कोई बेहती नदी जो केवल बहती है, शायद बेहना चाहती भी नहीं परन्तु बेहना ही उसका मूल स्वभाव है तो बहती है। उसकी आवाज़ उस ध्वनि की याद दिलाती जो तेज़ हवा चलने पर पेड़ो के आपस में टकराते से आती है,यह आवाज़ वहीं  समझ सकता है जो पेड़ो को जानता हो, उनके स्वभाव को पहचानता हो। वह आवाज़ किसी घने पेड़ के नीचे आने वाली हवा की तरह थी। हवा कभी गर्म, कभी शीतल, कभी केवल साधारणतः होती है,पर प्रत्येक बार यह हवा शरीर को छूते हुए रूह तक जाती ह...