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                                                         "तुमसे प्यार हो जाना" जैसे किरणों का बादलो से छन कर आना, नदियों का चट्टानों को बहा ले जाना, किसी स्वतंत्र पक्षी का इन्द्रधनुष में उड़ते ही जाना, हां ऐसा ही अद्भुत है, तुमसे प्यार हो जाना। किसी सुर का यंत्र को छोड़ स्वछंद हो जाना, कवि का शब्दों को मिटा कविता सुनाना, आत्मा का शरीर को त्याग स्वच्छ हो जाना, हां ऐसा ही अद्भुत है, तुमसे प्यार हो जाना। वृक्षों का हवाओं में झूम नृत्य कर जाना, बूंदों का पत्तो पर ठहर मोती हो जाना, डालो का झूला बन, सभी को निःस्वार्थ झुलाना, हां ऐसा ही अद्भुत है, तुमसे प्यार हो जाना। सूर्य का खुद में तप रोशन हो जाना, चन्द्र का पीड़ा सह, चांदनी बरसाना, दोनों का वर्षों में कभी एक हो जाना, हां ऐसा ही अद्भुत है, तुमसे प्यार हो जाना। अंधेरी रहो में किसी का साथ पा जाना, साथ पा फिर उससा हो जाना, खुद ना समझे, पर सभी को समझाना, हां ऐसा ही अ...
वह गली का काला कुत्ता, जो हर तेडी चाल पर भोकता है, अपराध को होने से पहले रोकता है, हमारे भीतर छिपे भय को सोकता है, हां यही है, जो आपको किसी खतरे से पहले टोकता है। वह गली का काला कुत्ता, अंतर्मन की आवाज़ है, सदैव सत्य पर चलने की पुकार है, कठिनाई से बचाने का ऐतिहात है, जैसे स्वयं में आत्मसाक्षात्कार है, वह काला कुत्ता, समाज की झनकार है, उसे ना कोई आशा, ना हमसे स्वार्थ है, फिर भी बढ़ाता सहायता के कदम हजार है, शायद इसीलिए, मां आज भी दिन कि पहली रोटी उसे ही देती है, सदस्य ये भी है घर का, मुस्कुराकर कहती है। -Tushar Ramdiya
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                                             कुछ खोकर, कुछ होजाना बात करते तेरा समीप आजाना, कितना अद्भुत है, कुछ खोकर, कुछ होजाना। बेमतलब तेरा हाथ थामना, तेरी सांसों का चेहरे से टकराना, फिर दो उड़ती सांसों का मिल एक बन जाना, कितना अद्भुत है, कुछ खोकर, कुछ होजाना। किसी राही का बस्ता उठाना, फिर दूर क्षितिज में डूब गोते लगाना, मकान नहीं, अपनों का साथ ही घर हो जाना, कितना अद्भुत है, कुछ खोकर, कुछ होजाना। राम का सीता को वनवास पहुंचाना, कृष्ण व राधा का साथ खोजाना, फिर भी स्वयं को हर मंदिर, मंत्र और पूजा में पाना, कितना अद्भुत है, कुछ खोकर, कुछ होजाना। आकाश से जल का लहराकर आना, धरती में समा प्यास बुझाना, पुनः प्रकृति को हरा भरा कर जाना, कितना अद्भुत है, कुछ खोकर, कुछ होजाना। किसी विपत्ति में, बदनामी का आना, आपके खास लोगो का साथ छुड़ाना, फिर किसी रहगुजर का हाथ थाम “मित्र” बनाना, कितना अद्भुत है, कुछ खोकर, कुछ होजाना। जीवन का हर कदम ऐतिहातन बढ़ा...
(चहरा और गांव) गांव, सभी कहते है गाव यह है वह है। लेकिन मेरे लिए गांव यानी वह, उसका चेहरा। गांव मुझे उसकी, उसके चेहरे की याद दिलाता और उसका चेहरा किसी सादगी से पूर्ण खुशहाल ग्रामीण परिवेश की। ख़ेर हर कोई अपने अनुभवों से हर विषय पर अपनी अलग परिभाषा देते है। इसी तरह मेरा भी अपना अनुभव है, मेरा अपना गांव, यानी मेरी अपनी परिभाषा। प्रथम भाव गांव की प्रकृति जो आजाद, बेबाक और निरंतर बहने वाली, जैसे उसका व्यक्तिव जो अपने आप में आजाद, बेबाक और निरंतर बहने वाला था। प्रकृति कभी किसी का नियम या कानून नहीं मानती, उसी तरह वह अपने आप में स्वच्छंद बहने वाली थी, मानो जैसे कोई बेहती नदी जो केवल बहती है, शायद बेहना चाहती भी नहीं परन्तु बेहना ही उसका मूल स्वभाव है तो बहती है। उसकी आवाज़ उस ध्वनि की याद दिलाती जो तेज़ हवा चलने पर पेड़ो के आपस में टकराते से आती है,यह आवाज़ वहीं  समझ सकता है जो पेड़ो को जानता हो, उनके स्वभाव को पहचानता हो। वह आवाज़ किसी घने पेड़ के नीचे आने वाली हवा की तरह थी। हवा कभी गर्म, कभी शीतल, कभी केवल साधारणतः होती है,पर प्रत्येक बार यह हवा शरीर को छूते हुए रूह तक जाती ह...
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                                  दृष्टिकोण आज सुबह से ही मयानागरी के बस स्टेशन पर तीनों दोस्त घनश्याम, गोलू और फिरोज़ अपना सारा काम छोड़ कर, अपने दोस्त भुरू का इंतज़ार कर रहे थे। करते भी क्यों ना, आज भुरू 5 साल बाद शहर से अपने गांव लौट रहा था। तीनों दीपू अंकल की दुकान पर बैठ, भुरू की बस का इंतज़ार कर रहे थे। घनश्याम बीड़ी पीता हुए उस खाली जगह को घुर रहा था, जहां आकर बस लगने वाली थी। परेशान होकर घनश्याम बोल पड़ा " ना जाने क्या होगा इस देश का, बताओ बस वक़्त से आधा घंटा लेट है। " फिरोज़ चाय पीता हुए बोला " इसमें देश का क्या होगा? देश भी बस में लद कर शहर से गांव आ रहा है क्या? " गोलू ने उत्तर देते हुए कहा " गांव नहीं, लद कर देश शहर जा रहा है। ऐसा हमने अख़बार में पढ़ा था।" घनश्याम यह बाते सुन चिढ़ा " कोई कहीं भी लद कर जाए उससे हमें क्या, अभी तो हमारा बहुमूल्य वक़्त बर्बाद हो रहा है।" गोलू ,घनश्याम की बात पर आश्चर्य से बोला " तेरा वक़्त बहुमूल्य कब से हो गया, कुएं में नहाना और नहाने के बाद ...
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                                "मित्रता" माया नगरी में रोज़ की तरह शाम के वक़्त बरगद के नीचे जुगनू काका की चौपाल लगी हुई थी। सभी अपनी - अपनी समस्या और सवाल जुगनू काका के सामने रख रहे थे, और जुगनू काका बड़ी शांति से सभी का उत्तर दे रहे थे। घनश्याम काफी देर से अपने भीतर एक सवाल लिए बैठा था। जुगनू काका ने घनश्याम को परेशान देख स्वयं ही पूछ लिया "कहो घनश्याम, कुछ पूछना चाहते हो।" घनश्याम बोल उठा "काका मित्रता किसे कहते है?" जुगनू काका मुस्कुराकर बोले  "मित्रता, इसके लिए तो तुम्हें एक कहानी सुनानी होगी।" घनश्याम ने कहा  "कहानी?" जुगनू काका ने उत्तर दिया  "हा‌‌ॅ कहानी, कहानी का शीर्षक ही है "मित्रता" - एक हष्टपुष्ट नौजवान एक छोटे से कमरे में रहा करता था। उस नौजवान को अपना छोटा सा कमरा भी बड़ा सा लगता था, क्योंकि उसने कभी भी बाहर की दुनिया देखी ही नहीं थी। उसका जन्म उसी छोटे कमरे में हुआ था। यहां उसके ज़रूरत का सारा सामान मौजूद था। खाना,पीना, सोने के लिए बिस्तर, पढ़ने के लिए कि...
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जन्म तिथि के नक्षत्र, समस्त योग जहाँ बहे थेे, ब्रम्हांड ध्वनि को हम अक्षर में कहे थे, जी हाँ, पहला अक्षर हम माँ कहे थे। बाल अवस्था,किशोर अवस्था और वृद्ध अवस्था, जिस ऊर्जा के सहारे रहे थे, जिसके नज़र में,हमारे कर्म-अकर्म समान रहे थे, जी हाँ, पहला अक्षर हम माँ कहे थे। जीवन सूत्रधार जिसे कहे थे, जिस पर कविताएँ लिख-लिख थक चुके थे, हर रचना में जिसे अभिव्यक्त किये थे, जी हाँ, पहला अक्षर हम माँ कहे थे। भूत, भविष्य, वर्तमान जिसने रचे थे, स्वयं समय चक्र जिसके द्वारा पाल बने थे, मुझ पर काल के क्षण, महाकाल जिससे भयभीत हुए थे, जी हाँ, हम पहला अक्षर माँ कहे थे। जिसकी कृपा से मोक्ष द्वार पर आकर खड़े है, 36 करोड़ नही,हम एक देवता के भक्त रहे है, हे विष्णु, करदे पुनर्जन्म, ताकि सदैव गर्व रहे की, जी हाँ, पहला अक्षर हम माँ कहे थे।  -Tushar Ramdiya