(चहरा और गांव)

गांव, सभी कहते है गाव यह है वह है। लेकिन मेरे लिए गांव यानी वह, उसका चेहरा। गांव मुझे उसकी, उसके चेहरे की याद दिलाता और उसका चेहरा किसी सादगी से पूर्ण खुशहाल ग्रामीण परिवेश की।
ख़ेर हर कोई अपने अनुभवों से हर विषय पर अपनी अलग परिभाषा देते है। इसी तरह मेरा भी अपना अनुभव है, मेरा अपना गांव, यानी मेरी अपनी परिभाषा।

प्रथम भाव गांव की प्रकृति जो आजाद, बेबाक और निरंतर बहने वाली, जैसे उसका व्यक्तिव जो अपने आप में आजाद, बेबाक और निरंतर बहने वाला था। प्रकृति कभी किसी का नियम या कानून नहीं मानती, उसी तरह वह अपने आप में स्वच्छंद बहने वाली थी, मानो जैसे कोई बेहती नदी जो केवल बहती है, शायद बेहना चाहती भी नहीं परन्तु बेहना ही उसका मूल स्वभाव है तो बहती है।

उसकी आवाज़ उस ध्वनि की याद दिलाती जो तेज़ हवा चलने पर पेड़ो के आपस में टकराते से आती है,यह आवाज़ वहीं  समझ सकता है जो पेड़ो को जानता हो, उनके स्वभाव को पहचानता हो।
वह आवाज़ किसी घने पेड़ के नीचे आने वाली हवा की तरह थी। हवा कभी गर्म, कभी शीतल, कभी केवल साधारणतः होती है,पर प्रत्येक बार यह हवा शरीर को छूते हुए रूह तक जाती है और आप उस हवा को बस महसूस करते हो कभी उससे कुछ कहते नहीं, बस उस हवा को स्वयं को भीतर तक छूने देते हो।

उसके बाल किसी लहलती फसल की तरह थे, जो सौंदर्य भाव से इतनी सुन्दर होती है कि कोई व्यक्ति उन्हें घंटो तक देख सके। वह फसल जिसके सामने बड़े बड़े महल भी सुन्दर नहीं लगते है, क्योंकी वह फसल यानी उसके बाल प्रति क्षण जीवन की पुकार लगाते है। उसके बालो को देखने पर मुझे जीवन की एक नई पुकार सुनाए देती थी और विश्वास होता था की जीवन होता है, वह भी पूर्ण जीवित रूप में। उसके बाल आपकी स्मरण शक्ति को बिल्कुल खत्म कर देते , जिससे आपको समझ आता कि शायद जीवन जीने के लिए है नाकी सोचने के लिए।

उसका ललाट जिसे आम भाषा में माथा या सिर कहते है। वो बिल्कुल किसी शुद्ध नव निर्मित ओटले के समान लगता, जिसे केवल देखने पर भी किसी भी चिंता, या परेशानी में व्यक्ति स्थिर और आंदित हो जाए । नव निर्मित ओटले को छूने पर व्यक्ति को ऐसा लगता है, की यही समस्त संसार में एक मात्र सुकून भरा स्थान है। ओटले पर बैठते ही व्यक्ति के मन में यह भाव आत है, की यही वह स्थान है जहां में जीवन भर घर बना रह सकता हूं। यही उसके ललाट को देखने पर, छूने पर, महसूस करने पर, होता था, वहां शांति महसूस होती, गाड़ी ,गहरी शांति। उसका ललाट किसी चिकने पत्थर की तरह आकर्षक, एवम् मोहक था, पर किसी जटिल पहाड़ की तरह स्थिर, जिसे देख किसी भी तरह से भटका हुआ व्यक्ति शांत एवम् आनंदित हो जाए।

फिर उसकी भोहे, मुझे उस क्षण की याद दिलाती जिसमे कपास स्वतंत्रा से टूट दो भागो में होकर, ज़मीन को छूने से पहले बिना किसी सांसारिक भार के स्वयं में ही बेहता है। उसकी भॊहे का हर मूवमेंट किसी नागिन के अदृश्य जादू या किसी ऋषि के सिद्ध मंत्र की तरह काम करता, जिसमे आपके कुछ जानने और समझने से पहले ही आप सम्मोहित हो चुके होते, अपने आप को खो चुके होते हो।

उसकी पलके भरी गर्मी में बादल के भीतर से आने वाली शीतल धूप की तरह थी, जो कितनी भी व्यस्थ विचार या भाव को रोककर, अपनी ही छाया में रहने को कहती है। उसका पलके झपकाना ऐसा लगता मानो सूर्य अस्त हो फिर उदय हुआ हो, और आसमान में केवल बादल याने उसकी पलके ही रह जाती। बदलो को निरंतर देखने पर यह आभास होता है मानो बादल और आपकी दूरी लगातार कम होते जा रही है। यही उसकी पलकों को देखने पर लगता था, जैसे उसकी  पलकों के कारण, बीच की सारी दूरी ही खत्म हो गई हो। उसकी लम्बी लम्बी पलके आपको स्वयं के स्वयं से भी निकट जान पड़ती। मानो आप स्वयं को खो पलके ही बन चुके हो।

उसकी आंखे किसी पुराने कुएं की तरह थी, जिसे देख हर कोई आकर्षित हो करीब आकर झाकने का प्रयास करता है पर कुएं में पानी होने से अपने आप की ही परछाई पाता है। कुएं की तरह ही उसकी आखों में भी गहरा उतारना होना रहता था, क्यों की वहां आपको आपकी परछाई नहीं, कुआ असल में क्या है यह जानने को मिलता है।

उसकी नाक किसी सुन्दर घाटी पर बने किसी मकान की तरह थी, जो आपको यह बताता है कि कोई भी बात प्राकृतिक ढंग से की जाए तो वह स्वयं में पूर्ण होती है। उसे किसी दूसरी चीज़ की कोई आवश्यकता नहीं होती।

उसके गाल, खुले मैदान की तरह थे। गांव के मैदान की यह खासियत रहती है कि यही वह स्थान रहता है, जहां आकर व्यक्ति केवल इंसान रह जाता है। अनेक त्योहार, उत्सव या सुख और दुख कि अनेक बाते होती है। मैदान आपको गांव की असल स्थिति बताता के की संपूर्ण गांव किस मनोस्थती से गुजर रहा है। यही कार्य उसके गाल किया करते थे, उसके मन में चल रहे अनंत भावो को उसके चेहरे पर उतार लाते थे। और सबसे खास बात जो गांव के मैदान और उसके गालों में समान थी की कोई भी व्यक्ति वहां रहने पर , अपने ही घर जाने की इच्छा नहीं रखता।

उसके होठ, किसी शुद्ध व सिद्ध मंदिर में प्रवेश होने पर प्रस्फुटित होने वाले भाव के समान थे। उस मंदिर के, जिसके प्रवेश द्वार के स्पर्श मात्र से ही व्यक्ति स्वयं में जलते हुए अनंत उद्विग्न भावो को अंत होता पाता है। उसके होठ के छुअन मात्र से व्यक्ति इतना हल्का होजाए, मानो उस क्षण मानव चित्त के समस्त कर्तव्य, समस्त ज़िमेदारी खत्म हो केवल चित्त शेष रह रहा हो, जो अपने आप में ही अनंत आनंद का सागर है। उसके होठ किसी मंदिर की ही तरह मानुषम के मानव भाव का अंत करके, व्यक्ति को स्वयं के भीतर खींच ले जाती, शायद इसी लिए उसे मंदिर ( मन का द्वार ) कहा गया है।

उसका पूरा चेहरा एक साथ देखने पर यही भाव जन्मता की यह कोई सिद्ध मूर्ति है, जो इतनी आश्चर्य रूप से खूबसूरत है कि कोई भी व्यक्ति ये समझ ही नहीं पता की उसके साथ क्या व्यवहार किया जाना चाहिए। इसीलिए अंततः व्यक्ति कुछ समझ ना आने पर मूर्ति की पूजा करने लगता है।

और अंततः उसकी मुस्कुराहट, उसको मुस्कुराते हुए देखने पर मुझे समझ आया की वेदों मै इन्द्र को ब्रह्मा, विष्णु, महेश से भी ऊपर स्थान क्यों दिया गया है। क्यों की इन्द्र देव बारिश के देवता है, वहीं बारिश जो गावों में प्रत्येक बात निर्धारित करती है कि त्योहार किस तरह से बनेंगे, बेटी की शादी किस स्तर की होगी , गांव के वातावरण में सुख या दुःख किस भाव की वायु चलायमान रहेगी। उसी तरह केवल एक बार देखने पर उसकी मुस्कुराहट ही इस बात की निर्णयकर्ता बन जाती , कि अब आपके जीवन में सुख रहेगा या दुःख।
जन्म देने वाले ब्रह्म, जीवन क्या है बताने वाले शिव और जीवन जीना कैसे है बताने वाले विष्णु है। परन्तु जीवन में जीवित कुछ रहेगा जा नहीं यह निर्धारित करने वाले इन्द्र याने बारिश के देवता अर्थात उसकी मुस्कुराहट।

यह मेरा अनुभव था अतः मेरा गांव। सबसे खूबसूरत बात, एक बार स्वयं के गांव से मुलाकात होने पर पर, खुद का अपना गांव मिल जाने के बाद समस्त संसार खूबसूरत हो जाता है।

- TUSHAR RAMDIYA




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