"मित्रता"
माया नगरी में रोज़ की तरह शाम के वक़्त बरगद के नीचे जुगनू काका की चौपाल लगी हुई थी। सभी अपनी - अपनी समस्या और सवाल जुगनू काका के सामने रख रहे थे, और जुगनू काका बड़ी शांति से सभी का उत्तर दे रहे थे।
घनश्याम काफी देर से अपने भीतर एक सवाल लिए बैठा था। जुगनू काका ने घनश्याम को परेशान देख स्वयं ही पूछ लिया "कहो घनश्याम, कुछ पूछना चाहते हो।"
घनश्याम बोल उठा "काका मित्रता किसे कहते है?"
जुगनू काका मुस्कुराकर बोले "मित्रता, इसके लिए तो तुम्हें एक कहानी सुनानी होगी।"
घनश्याम ने कहा "कहानी?"
जुगनू काका ने उत्तर दिया "हाॅ कहानी, कहानी का शीर्षक ही है "मित्रता" -
एक हष्टपुष्ट नौजवान एक छोटे से कमरे में रहा करता था। उस नौजवान को अपना छोटा सा कमरा भी बड़ा सा लगता था, क्योंकि उसने कभी भी बाहर की दुनिया देखी ही नहीं थी। उसका जन्म उसी छोटे कमरे में हुआ था।
यहां उसके ज़रूरत का सारा सामान मौजूद था। खाना,पीना, सोने के लिए बिस्तर, पढ़ने के लिए किताबें।
पर दो बाते थी, जो उसे लगातार परेशान किये हुए थी। पहली उसके कमरे की खिड़की, जो उसे बाहर का नज़ारा दिखाती और दूसरा उसके कमरे का दरवाज़ा जो आज तक उससे खुला नहीं था।
वो बचपन से उस खिड़की से झांका करता, जो उसे बाहर की दुनिया दिखाती, जहां वो कभी नहीं गया था।
इसी बात को लेकर वो काफी परेशान सा रहने लगा और एक दिन दरवाज़ा खोल बाहर जाने का संकल्प लीया।
नौजवान दरवाज़ा खोलने के कार्य में सुबह से ही लग गया, लेकिन अनेक प्रयासों के बाद भी रात तक दरवाज़ा हिला तक नहीं था। कमरे में ऐसी कोई वस्तु नहीं बची थी, जिसके इस्तमाल से उसने दरवाज़ा ना खोलना चाहा हो। तभी अचानक उसे घासलेट की केन दिखाई दी, उसे अपने आप हॅसी आई की मैने ये पहले क्यों नहीं सोचा कि घासलेट से दरवाज़े को जला कर कमज़ोर किया जाए, फिर उसे आसानी से तोड़ा जा सकेगा। नौजवान अपने इस आईडिया से काफी खुश था, तभी उसे ध्यान आया कि यही घासलेट वह खाना बनाने में इस्तमाल करता है और दरवाज़ा जलाने के बाद इतना घासलेट भी नहीं बचेगा की वो अगली सुबह का खाना बना सके। अब नौजवान का सामने एक चुनाव था कि अपने खाने के ईंधन का इस्तमाल अपनी आज़ादी, अपनी जिज्ञासा के लिए करे या हर रोज़ की तरह घासलेट का इस्तमाल खाने के लिए करे।
नौजवान ने अपनी जिज्ञासा को अधिक महत्व दिया और घासलेट से दरवाज़ जला कर उसे तोड़ दिया।
अब नौजवान के आगे वो दुनिया खुल चुकी थी जिसे उसने केवल अपनी खिड़की से देखा था। बाहर रात होने के कारण काफी अंधेरा था, कहीं भी रोशनी की एक किरण तक नहीं थी। नौजवान ने हिम्मत बांध अपना पहला क़दम बढ़ाया और घर से बाहर जाते ही घर का जला दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
नौजवान की लाख कोशिशों के बाद भी, दरवाज़ा नहीं खुला। सड़क पर अमावस का अंधेरा छाया हुए था, कहीं कुछ नज़र ही नहीं आता था। जो कुछ भी नौजवान को खिड़की से देखने पर दिखा था, वो उसी के कमरे के बल्ब का उजाला था। जो अब खिड़की, दरवाज़ा बंद होने की वजह से बाहर नहीं आ पा रहा था।
नौजवान को घबराहट के कारण पसीना आने लगा, वह पहली बार घर से बाहर निकाल था, ऊपर से रात का गढ़ा अंधेरा और दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था।
नौजवान वहीं दरवाज़े से लिपट बैठ गया, कुछ देर ऐसे ही बैठने के बाद नौजवान ने सोचा कि यहां यू ही बैठने का कोई फ़ायदा नहीं।
और इसी सोच के साथ नौजवान धीरे - धीरे आगे बढ़ने लगा। तभी कुछ ही दूरी पर उसे एक बल्ब की रोशनी खिड़की से आती दिखाई दी।
नौजवान रफ्तार से उस रोशनी की आेर भागा, वह रोशनी की निकट पहुंचा ही था कि, तभी दरवाजा बंद होने की आवाज़ आई और रोशनी चली गई।
अब पहले नौजवान के सामने दूसरा घबराया हुआ नौजवान आ खड़ा हुआ था। दोनों एक दूसरे को बड़ी आश्चर्य से देख रहे थे, दोनों ही एक दूसरे में कहीं न कहीं स्वयं का प्रतिबिंब देख रहे थे। दोनों मानो बिना मुलाकात के ही एक दूसरे को जानते हों।
पहले नौजवान ने दूसरे नौजवान की तरफ हाथ बढ़ाया और दूसरे ने अपनत्व के साथ पहले का साथ स्वीकार। फिर दोनों साथ होकर बाहरी दुनिया के सफर में चल दिये, इस तरह दोनों ने एक दूसरे का साथ देकर, एक दूसरे की मदद कर बाहर की दुनिया को जाना।
जुगनू काका बोले "समझे घनश्याम, पहले नौजवान का बढ़ाया हुआ हाथ मित्रता की शुरुआत है।
और दोनों का साथ "मित्रता"
-Tushar ramdiya
माया नगरी में रोज़ की तरह शाम के वक़्त बरगद के नीचे जुगनू काका की चौपाल लगी हुई थी। सभी अपनी - अपनी समस्या और सवाल जुगनू काका के सामने रख रहे थे, और जुगनू काका बड़ी शांति से सभी का उत्तर दे रहे थे।
घनश्याम काफी देर से अपने भीतर एक सवाल लिए बैठा था। जुगनू काका ने घनश्याम को परेशान देख स्वयं ही पूछ लिया "कहो घनश्याम, कुछ पूछना चाहते हो।"
घनश्याम बोल उठा "काका मित्रता किसे कहते है?"
जुगनू काका मुस्कुराकर बोले "मित्रता, इसके लिए तो तुम्हें एक कहानी सुनानी होगी।"
घनश्याम ने कहा "कहानी?"
जुगनू काका ने उत्तर दिया "हाॅ कहानी, कहानी का शीर्षक ही है "मित्रता" -
एक हष्टपुष्ट नौजवान एक छोटे से कमरे में रहा करता था। उस नौजवान को अपना छोटा सा कमरा भी बड़ा सा लगता था, क्योंकि उसने कभी भी बाहर की दुनिया देखी ही नहीं थी। उसका जन्म उसी छोटे कमरे में हुआ था।
यहां उसके ज़रूरत का सारा सामान मौजूद था। खाना,पीना, सोने के लिए बिस्तर, पढ़ने के लिए किताबें।
पर दो बाते थी, जो उसे लगातार परेशान किये हुए थी। पहली उसके कमरे की खिड़की, जो उसे बाहर का नज़ारा दिखाती और दूसरा उसके कमरे का दरवाज़ा जो आज तक उससे खुला नहीं था।
वो बचपन से उस खिड़की से झांका करता, जो उसे बाहर की दुनिया दिखाती, जहां वो कभी नहीं गया था।
इसी बात को लेकर वो काफी परेशान सा रहने लगा और एक दिन दरवाज़ा खोल बाहर जाने का संकल्प लीया।
नौजवान दरवाज़ा खोलने के कार्य में सुबह से ही लग गया, लेकिन अनेक प्रयासों के बाद भी रात तक दरवाज़ा हिला तक नहीं था। कमरे में ऐसी कोई वस्तु नहीं बची थी, जिसके इस्तमाल से उसने दरवाज़ा ना खोलना चाहा हो। तभी अचानक उसे घासलेट की केन दिखाई दी, उसे अपने आप हॅसी आई की मैने ये पहले क्यों नहीं सोचा कि घासलेट से दरवाज़े को जला कर कमज़ोर किया जाए, फिर उसे आसानी से तोड़ा जा सकेगा। नौजवान अपने इस आईडिया से काफी खुश था, तभी उसे ध्यान आया कि यही घासलेट वह खाना बनाने में इस्तमाल करता है और दरवाज़ा जलाने के बाद इतना घासलेट भी नहीं बचेगा की वो अगली सुबह का खाना बना सके। अब नौजवान का सामने एक चुनाव था कि अपने खाने के ईंधन का इस्तमाल अपनी आज़ादी, अपनी जिज्ञासा के लिए करे या हर रोज़ की तरह घासलेट का इस्तमाल खाने के लिए करे।
नौजवान ने अपनी जिज्ञासा को अधिक महत्व दिया और घासलेट से दरवाज़ जला कर उसे तोड़ दिया।
अब नौजवान के आगे वो दुनिया खुल चुकी थी जिसे उसने केवल अपनी खिड़की से देखा था। बाहर रात होने के कारण काफी अंधेरा था, कहीं भी रोशनी की एक किरण तक नहीं थी। नौजवान ने हिम्मत बांध अपना पहला क़दम बढ़ाया और घर से बाहर जाते ही घर का जला दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
नौजवान की लाख कोशिशों के बाद भी, दरवाज़ा नहीं खुला। सड़क पर अमावस का अंधेरा छाया हुए था, कहीं कुछ नज़र ही नहीं आता था। जो कुछ भी नौजवान को खिड़की से देखने पर दिखा था, वो उसी के कमरे के बल्ब का उजाला था। जो अब खिड़की, दरवाज़ा बंद होने की वजह से बाहर नहीं आ पा रहा था।
नौजवान को घबराहट के कारण पसीना आने लगा, वह पहली बार घर से बाहर निकाल था, ऊपर से रात का गढ़ा अंधेरा और दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था।
नौजवान वहीं दरवाज़े से लिपट बैठ गया, कुछ देर ऐसे ही बैठने के बाद नौजवान ने सोचा कि यहां यू ही बैठने का कोई फ़ायदा नहीं।
और इसी सोच के साथ नौजवान धीरे - धीरे आगे बढ़ने लगा। तभी कुछ ही दूरी पर उसे एक बल्ब की रोशनी खिड़की से आती दिखाई दी।
नौजवान रफ्तार से उस रोशनी की आेर भागा, वह रोशनी की निकट पहुंचा ही था कि, तभी दरवाजा बंद होने की आवाज़ आई और रोशनी चली गई।
अब पहले नौजवान के सामने दूसरा घबराया हुआ नौजवान आ खड़ा हुआ था। दोनों एक दूसरे को बड़ी आश्चर्य से देख रहे थे, दोनों ही एक दूसरे में कहीं न कहीं स्वयं का प्रतिबिंब देख रहे थे। दोनों मानो बिना मुलाकात के ही एक दूसरे को जानते हों।
पहले नौजवान ने दूसरे नौजवान की तरफ हाथ बढ़ाया और दूसरे ने अपनत्व के साथ पहले का साथ स्वीकार। फिर दोनों साथ होकर बाहरी दुनिया के सफर में चल दिये, इस तरह दोनों ने एक दूसरे का साथ देकर, एक दूसरे की मदद कर बाहर की दुनिया को जाना।
जुगनू काका बोले "समझे घनश्याम, पहले नौजवान का बढ़ाया हुआ हाथ मित्रता की शुरुआत है।
और दोनों का साथ "मित्रता"
-Tushar ramdiya

Comments
Post a Comment