दृष्टिकोण


आज सुबह से ही मयानागरी के बस स्टेशन पर तीनों दोस्त घनश्याम, गोलू और फिरोज़ अपना सारा काम छोड़ कर, अपने दोस्त भुरू का इंतज़ार कर रहे थे।
करते भी क्यों ना, आज भुरू 5 साल बाद शहर से अपने गांव लौट रहा था।
तीनों दीपू अंकल की दुकान पर बैठ, भुरू की बस का इंतज़ार कर रहे थे।
घनश्याम बीड़ी पीता हुए उस खाली जगह को घुर रहा था, जहां आकर बस लगने वाली थी। परेशान होकर घनश्याम बोल पड़ा " ना जाने क्या होगा इस देश का, बताओ बस वक़्त से आधा घंटा लेट है। "
फिरोज़ चाय पीता हुए बोला " इसमें देश का क्या होगा? देश भी बस में लद कर शहर से गांव आ रहा है क्या? "
गोलू ने उत्तर देते हुए कहा " गांव नहीं, लद कर देश शहर जा रहा है। ऐसा हमने अख़बार में पढ़ा था।"
घनश्याम यह बाते सुन चिढ़ा " कोई कहीं भी लद कर जाए उससे हमें क्या, अभी तो हमारा बहुमूल्य वक़्त बर्बाद हो रहा है।"
गोलू ,घनश्याम की बात पर आश्चर्य से बोला " तेरा वक़्त बहुमूल्य कब से हो गया, कुएं में नहाना और नहाने के बाद लाल चड्डी पहने ख़ेत में चक्कर लगाना भी वक्त की बरबादी है।"
घनश्याम स्वयं के बचाव में बोला " ताने क्या मार रहा है, तू तो सुबह से पटवारी का काम करता होगा?"
गोलू स्वयं की वकालत करते हुए बोला " पटवारी से भी ज्यादा मेहनत का काम करता हूं, सुबह से दुकान की वसूली पर जाता हूं।"
फिरोज़ ने मज़े लेते हुए कहा " पर वसूली से कभी पैसा वसूल कर नहीं ला पाता, अंकलजी को भी अब यकीन होने लगा है, कि पक्का तुम्हारी बीड़ी, भांग पीने की अफ़वा सच है।
फिरोज़ और घनश्याम दोनों हस्ते है, दोनों को हस्ता देख गोलू कहता है " ऐ कालू (फिरोज़ का रंग काला होने के कारण दोस्त उसे कालू भी कहते थे) तू क्या हस रहा है, तेरे जैसे आधी दोपहर तक सोया नहीं रहता।
फिरोज़ स्टाइल से रोमांटिक हीरो की तरह बोला " दोपहर तक इसलिए सोता हूं, क्योंकि रात भर तुम्हारी भाभियों से बात जो करनी होती है।"
घनश्याम बोला " भाभियों, बहुवचन? क्यों, आज कल कितनी लड़कियों से बात कर रहा है? "
फिरोज़ शर्मा कर बोला "तीन"
गोलू, फिरोज़ के जवाब से हैरान हो गया " तीन से एक रात में कैसे बात कर लेता है?"
फिरोज़ बड़े घमंड से समझाने लगता है " देखो टीवी पर पूरे दिन फिल्में आती है, लेकिन एक दूसरे के ऊपर कभी चढ़ती है क्या? सारा खेल टाइमिंग का है, किस समय पर कौन सी फिल्म चलाना है।"
घनश्याम ने बड़ी उत्सुकता से पूछा "मतलब"
फिरोज़ आवाज़ में और भी अभिमान लाकर बोला " हमने सारी फिल्मों, मेरा मतलब लड़कियों को टाइम देकर रखा है। जैसे रीना 9 से 12, शीना 12 से 3 और शकीना 3 से 6।
इस बात पर चाय की दुकान के मालिक दीपू अंकल भड़क गए, उनकी बेटी का नाम भी शकीना है। जो 6 महीने पहले ही घर छोड़ कर भाग गई थी। दीपू अंकल का असली नाम दानिश था पर प्यार से सब उन्हें दीपू अंकल कहते थे।
दीपू अंकल फिरोज़ की कॉलर पकड़ तोते की तरह एक बात दोहराते जाते " जा़लिम,बदमाश,आवारा,मजनू की ओलाद तो तू है शकीना का आशिक, मै तुझे ज़िंदा नहीं छोडूंगा।"
आस - पास के सभी लोगो ने मिलकर ज़ोर लगाया, तब जाकर फिरोज़, दीपू अंकल की पकड़ से छूट पाया। किसी करीबी से आहत होने के बाद व्यक्ति ऐसा हो ही जाता है। किसी से कुछ संबंध जोड़ता नहीं, मगर किसी को एक बार पकड़ ले तो छोड़ने का नाम नहीं लेता।
तीनों ने मिलकर दीपू अंकल को बड़ी मुश्किल से समझाया कि फिरोज़ वाली दूसरी शकीना है, यह पास के गांव में रहती है। जब फिरोज़ ने अपनी वाली शकीना का फोटो दिखाया तब जाकर दीपू अंकल कुछ शांत हुए।

समय के साथ स्टेशन पर भुरू की बस आ गयी। चारो दोस्त वापस से पहले जैसे मिल खुशी से पागल हो गए, भुरू को खुशी में कंधे पर उठा लिया। ऐसा उत्सा अक्सर तभी देखने को मिलता है, जब कोई नेता झूठे सपने दिखा जनता में जोश भरता है। पर यहां ना सपना था, ना झूठ, यहां थी केवल उस बचपन कि यादे जो कैसी भी परिस्थितियों में बीता हो, पर सबसे ज्यादा अपना होता है।
उसी अपनत्व में तीनों भुरू का स्वागत पूरे उत्साह से कर रहे थे। फिरोज़ इस अधूरी चौकड़ी को पांच साल बाद पुनः पूर्ण होता देख, इतना भावुक हो गया की भुरू तो अलग, घनश्याम व गोलू से भी गले मिल आंसू बहाने लगा। तब जाकर बाकी तीनों समझे की यह मिलाप तो राम - भरत से भी एक कदम आगे निकल गया है।
फिर क्या था, सभी ने होश सम्हाला और पहले के दिनों की तरह प्लान बना मस्ती करने निकल गए।
सबसे पहले सफर की थकान मिटाने के लिए घनश्याम के खेत गए जहां जम कर कुएं में नहाना हुआ। रात को वहीं मुर्गा पार्टी का भी प्लान बना।
पर रात होने में काफी समय बाकी था, तो समय का सदुपयोग करते हुए निकल गए गांव के भ्रमंड पर।
गांव की गलियों में घूम उन्हें महसूस हुआ कि समय कितना बदल चुका है। जिन घरों के सामने वह लोग लड़कियां देखने के लिए निकलते थे, आज वहां बुजुर्गो एवं घर में बंधी बकरियों के अलावा और कोई नहीं दिखाई देता। चारों इस बात पर ध्यान लगा बैठे, की शादी कितनी अजीब चीज़ होती है, कहीं दूर एक घर की रौनक बढ़ाने के लिए अपनी पूरी गली सुनी कर देती है।
जब गांव की गलियों में आनंद नहीं मिला, तो निकल गए बल्ला और गेंद उठा कर मैदान में और बचपन की तरह क्रिकेट खेलने लगे।
दो - दो लोगो की टीम बाटी गई और चालू हुआ चार - चार ओवर का मैच।
एक टीम में हुए घनश्याम व फिरोज़ और दूसरी में भुरू व गोलू। मैच में कुछ भी ग़लत होने पर घनश्याम बिल फिरोज़ पर फाड़ देता, चाहे उसमें फिरोज़ की ग़लती हो या ना हो। एक बार तो घनश्याम से कैच छुटने पर भी, घनश्याम फिरोज़ पर बिगड़ने लगा कि तू बॉल पूरा हाथ घुमा कर नहीं डालता, जिस वजह से बॉल कैच के लिए तेढ़ी आती है।
अभी तक क्रिकेट के दो मैच हुए थे और दोनों टीमें एक - एक मैच जीत चुकी थी। सूर्य अस्त का समय हो चुका था और यह बात चारो को पता थी, की अंधेरा होने के कारण यह आखरी मैच होगा और जो भी टीम यह मैच जीतेगी वह कल तक हारने वाली टीम को ताने सुना - सुना कर उनके कानों को संसद भवन कर देगी।
टॉस हुआ, भुरू ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी करने उतरा, फिरोज़ हाथ में बॉल लिए अपनी तेज़ गेंदबाज़ी के लिए तैयार हुआ।
तभी अचानक कहीं से हेलीकॉप्टर की आवाज़ आने लगी।
सभी का ध्यान एक दम से आने वाली आवाज़ पर गया, हेलीकॉप्टर किसी मंत्री का था जो देश की हालत जानने के लिए हेलीकॉप्टर से गांव - गांव घूम रहा था।
हेलीकॉप्टर मैदान के ऊपर से निकला तो घनश्याम, गोलू, फिरोज़ तीनों उसके पीछे हाथ हिलाते, गलियाते और मंत्रीजी को नीचे उतरने की सलहा देते हुए अपनी मस्ती में दौड़ते - दौड़ते मैदान के कोने तक आगाए।
मंत्रीजी का हेलीकॉप्टर तेज़ी से निकलता हुआ दूसरे गांव को चला गया,भला मंत्रीजी को दूसरे क्षेत्र का भी निरीक्षण करना था।
जब तीनों (घनश्याम,गोलू,फिरोज़) ने पीछे मूड कर देखा, तो  भुरू यथा - स्थान हाथ में बल्ला लिए खड़ा था। तीनों आपस में बाते करने लगे "भुरू कितना मूर्ख है, सालो में एक बार हेलीकॉप्टर इतनी करीब से निकलता है और ये हाथ में बल्ला लिए बेवकूफों की तरह अपनी जगह पर ही खड़ा है।"

वहीं भुरू अपने यथा स्थान पर आश्चर्य से सोच रहा था " यह लोग कितने मूर्ख है, अपने बचपन के दोस्तो के साथ खेले जा रहे खेल को छोड़ कर, एक साधारण हेलीकॉप्टर के पीछे भाग रहे है।"

                                           -TUSHAR RAMDIYA


Comments

Popular posts from this blog