वह गली का काला कुत्ता,
जो हर तेडी चाल पर भोकता है,
अपराध को होने से पहले रोकता है,
हमारे भीतर छिपे भय को सोकता है,
हां यही है, जो आपको किसी खतरे से पहले टोकता है।
वह गली का काला कुत्ता,
अंतर्मन की आवाज़ है,
सदैव सत्य पर चलने की पुकार है,
कठिनाई से बचाने का ऐतिहात है,
जैसे स्वयं में आत्मसाक्षात्कार है,
वह काला कुत्ता, समाज की झनकार है,
उसे ना कोई आशा, ना हमसे स्वार्थ है,
फिर भी बढ़ाता सहायता के कदम हजार है,
शायद इसीलिए, मां आज भी दिन कि पहली रोटी उसे ही देती है,
सदस्य ये भी है घर का, मुस्कुराकर कहती है।

-Tushar Ramdiya





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